कुछ आवाज़ें…
मरने के बाद भी खामोश नहीं होतीं।
उत्तराखंड के पहाड़ी कस्बे शिवधारा में स्थित एक सौ साल पुरानी हवेली वर्षों से बंद पड़ी थी।
अपने दादा की मृत्यु के बाद विहान अवस्थी उस हवेली को बेचने के लिए वापस लौटता है।
सफाई करते समय उसे अटारी में एक पुराना, टूटा हुआ रेडियो मिलता है।
रेडियो के तार कटे हुए थे।
बैटरी नहीं थी।
और वह वर्षों से धूल में दबा पड़ा था।
विहान उसे कबाड़ समझकर एक कोने में रख देता है।
लेकिन उसी रात…
ठीक 12 बजे…
रेडियो अपने आप चालू हो जाता है।
उसमें से सिर्फ एक धीमी आवाज़ आती है—
“सच से मत भागो…”’
पहले विहान इसे भ्रम समझता है।
लेकिन अगले कई दिनों तक हर रात वही रेडियो अलग-अलग बातें कहता है।
कभी किसी का नाम…
कभी कोई तारीख…
कभी हवेली के तहखाने का जिक्र…
और कभी ऐसे राज़…
जो उसके परिवार के अलावा कोई जान ही नहीं सकता था।
धीरे-धीरे विहान को एहसास होता है कि यह रेडियो किसी आत्मा से नहीं…
बल्कि उसके परिवार के सबसे बड़े छुपे हुए सच से जुड़ा हुआ है।
और शायद…
उसका अपना अतीत भी उतना सच्चा नहीं जितना वह समझता था।
अब सवाल था—
यह रेडियो आखिर बोल कैसे रहा था?
उसकी आवाज़ किसकी थी?
और वह हर रात सिर्फ एक ही बात क्यों दोहराता था—
“सच से मत भागो…”
