अपनी दादी सरोज की मृत्यु के बाद 35 वर्षीय restoration photographer आरव मेहरा पत्नी नंदिनी के साथ लगभग अट्ठाईस साल बाद अपनी पुश्तैनी हवेली लौटता है। Attic में उसे एक विशाल पुराना लकड़ी का संदूक मिलता है जिस पर तीन जंग लगे ताले हैं। बचपन से उसे केवल एक नियम याद है—“वो संदूक कभी मत खोलना।” पहली रात ठीक 2:37 बजे संदूक के अंदर से तीन दस्तक आती हैं। अगली सुबह उसकी धूल पर लिखा मिलता है—“चाबी तुम्हारे पास है।” लेकिन असली झटका तब लगता है जब आरव को 1998 की एक photograph मिलती है जिसमें आठ वर्षीय आरव उसी संदूक के सामने एक छोटी लड़की के साथ बैठा है। Photograph के पीछे लिखा है—“आरव और नैना — हमारा खजाना।” आरव को नैना नाम की किसी लड़की की कोई याद नहीं।
All Chapters
- अध्याय 1 – वो बंद संदूक
- अध्याय 2 – अंदर से तीन दस्तक
- अध्याय 3 – चाबी तुम्हारे पास है
- अध्याय 4 – तस्वीर में मेरे साथ कौन है?
- अध्याय 5 – नैना कौन थी?
- अध्याय 6 – संदूक के अंदर मेरी आवाज़
- अध्याय 7 – उस रात नैना कहाँ गई थी?
- अध्याय 8 – रात 2:37 की ट्रेन
- अध्याय 9 – नैना मरी नहीं थी
- अध्याय 10 – दादी ने तीसरा ताला क्यों लगाया?
- अध्याय 11 – हमारा खजाना
- अध्याय 12 – संदूक खाली था
