पुरानी हवेली की दीवारें सदियों पुरानी कहानियाँ फुसफुसाती थीं, पर कोई सुनने वाला नहीं बचा था। रोहन ने जब अपनी दादी की मृत्यु के बाद इस घर में कदम रखा, तो रात का अंधेरा पहले ही उसे घेर चुका था। हवा में नमी और सड़ांध का मिश्रण था, जैसे समय यहाँ रुक गया हो। लकड़ी के फर्श पर उसके जूतों की आहट ही अजीब सी गूँजती थी।
रात के ठीक 3:07 बजे पहली दस्तक हुई।
रोहन बिस्तर पर करवट बदल रहा था। शहर की चकाचौंध छोड़कर इस गांव की नीरवता में आना उसके लिए नया अनुभव था। दादी की वसीयत में यह हवेली उसके नाम थी, पर परिवार के बाकी लोग इसे बेचने की सलाह दे रहे थे। “वो घर शापित है,” चाचा ने फोन पर कहा था, लेकिन रोहन ने हँसकर टाल दिया।
दस्तक दो बार हुई—धीमी, लेकिन दृढ़। जैसे कोई जानता हो कि घर में अब कौन रहता है। रोहन ने घड़ी देखी—3:07। बिजली गुल थी, मोबाइल की टॉर्च जलाकर वह दरवाजे तक पहुँचा। बाहर कोई नहीं। सिर्फ ठंडी हवा का झोंका और दूर कहीं कुत्तों का रोना।
फिर उसने देखा—दरवाजे के नीचे से एक पुरानी, पीली चिट्ठी सरक रही थी। कागज पर सिर्फ एक वाक्य लिखा था: “मुझे बाहर निकालो।”
उस रात रोहन सो नहीं पाया। सुबह उसने सोचा कि शायद कोई प्रैंक है, पर अगली रात फिर ठीक 3:07 बजे दस्तक हुई। इस बार चिट्ठी में लिखा था: “तुम्हारा खून भी वही है।”
हवेली के बंद कमरे की कुंडी अंदर से खुलती सुनाई दे रही थी। दीवारों में फुसफुसाहटें थीं। पुरानी तस्वीरों में परिवार के चेहरे ऐसे लगते थे जैसे वे जीवित हों और कुछ छुपा रहे हों। रोहन को एहसास हुआ कि यह घर सिर्फ ईंट और पत्थर नहीं, बल्कि एक जीवित रहस्य है। और वह रहस्य अब उसे निगलने को तैयार है।
जो सच सामने आने वाला था, वह पूरे परिवार को हमेशा के लिए बदल देगा।
