राजस्थान के वीरान गाँव चंद्रगढ़ में एक 500 साल पुरानी बावड़ी थी…
जिसके बारे में कहा जाता था कि उसमें उतरने वाला हर इंसान बदलकर वापस आता है…
अगर वापस आए तो।
गाँव वालों का विश्वास था कि बावड़ी की आख़िरी सीढ़ी के नीचे एक पत्थर का विशाल दरवाज़ा है…
जिसे सदियों पहले हमेशा के लिए बंद कर दिया गया था।
कोई नहीं जानता था कि उसके पीछे क्या है।
हर साल अमावस्या की रात उस बावड़ी से लोहे की जंजीरों के घिसटने की आवाज़ आती थी।
पानी अपने आप उफनने लगता था।
और ऐसा लगता था जैसे कोई बंद दरवाज़े के पीछे से बाहर निकलने की कोशिश कर रहा हो।
पुरातत्व विभाग का युवा अधिकारी आरव त्रिपाठी उस बावड़ी की खुदाई के लिए चंद्रगढ़ पहुँचता है।
वह इन कहानियों को अंधविश्वास मानता है।
लेकिन खुदाई के दौरान उसे एक तांबे की चाबी, दीवारों पर बने रहस्यमयी प्रतीक और एक अधूरी डायरी मिलती है।
डायरी की आखिरी पंक्ति पढ़कर उसके रोंगटे खड़े हो जाते हैं—
“अगर आख़िरी दरवाज़ा खुल गया… तो सिर्फ़ इतिहास नहीं, पूरा गाँव दफन हो जाएगा।”
अब सवाल था—
उस दरवाज़े के पीछे क्या छिपा है?
उसे बंद किसने किया था?
और क्यों पूरे गाँव ने सदियों तक इस रहस्य को दुनिया से छिपाकर रखा?
