आत्म-स्वीकार

आत्म-स्वीकार
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पंद्रह साल पहले…
एक फैसला लिया गया था।
उस फैसले ने किसी की जान नहीं ली…
लेकिन कई ज़िंदगियाँ अधूरी कर दीं।

समय आगे बढ़ गया।
घर बदल गए।
रिश्ते बदल गए।
लोग मुस्कुराना भी सीख गए।
लेकिन…
उनके भीतर रहने वाला अपराधबोध कभी बूढ़ा नहीं हुआ।

हर रात…
सोने से पहले…
हर कोई अपने आप से एक ही सवाल पूछता था—
“अगर उस दिन मैंने सच बोल दिया होता… तो क्या आज सब कुछ अलग होता?”
उन्हें दुनिया ने माफ़ कर दिया था।
लेकिन…
उन्होंने कभी खुद को माफ़ नहीं किया।

अब…
सालों बाद…
एक ऐसी घटना होने वाली थी…
जो पूरे परिवार को मजबूर कर देगी—
अपने अतीत का सामना करने के लिए।

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