आगे बढ़ने से पहले:
इस कहानी में ऐसे विषय और भाषा-शैली हो सकती है जो हर पाठक के लिए सहज न हो।
कृपया अपनी समझ और विवेक से आगे बढ़ें।
काल्पनिक पहाड़ी क्षेत्र कालवन के घने जंगलों के बीच स्थित है— रुद्रकोट हवेली। लेकिन आसपास के गाँव में कोई उसे इस नाम से नहीं बुलाता। वहाँ उसका नाम है— काली हवेली।
1879 में बनी इस हवेली के बारे में कहा जाता है कि इसका पहला मालिक देवव्रत रुद्रकोट लोगों की इच्छाओं से बेहद प्रभावित था। उसका विश्वास था— “इंसान जो करता है वह उसका सामाजिक चेहरा है। वह जो चाहता है… वही उसका असली चेहरा है।”
उसकी मृत्यु के बाद परिवार में कई रहस्यमयी घटनाएँ हुईं। एक भाई ने दूसरे की संपत्ति चाही— कुछ दिनों बाद दूसरा भाई मृत मिला। एक विवाहित महिला ने अपने पुराने प्रेम के साथ जिंदगी की कल्पना की— अगले सप्ताह उसका पति गायब हो गया। एक उत्तराधिकारी ने पूरी हवेली का अकेला मालिक बनने की इच्छा की— कुछ महीनों में बाकी परिवार खत्म हो गया। हर घटना के बाद हवेली के किसी कमरे की दीवार पर एक नया नाम दिखाई देता।
फिर 1996 में… हवेली अचानक बंद कर दी गई। अब तीस वर्ष बाद… इसके अंतिम मालिक अद्वैत रुद्रकोट की मृत्यु हुई है। उसकी वसीयत में बारह लोगों को बुलाया गया है। उनमें कुछ रिश्तेदार हैं। कुछ अजनबी। कुछ पुराने प्रेमी। कुछ दुश्मन। और नायरा— जिसका रुद्रकोट परिवार से कोई स्पष्ट संबंध नहीं।
वसीयत की अंतिम शर्त है— “सभी बारह वारिसों को काली हवेली में एक पूरी रात साथ बितानी होगी।” लेकिन हवेली में प्रवेश करने के बाद… नायरा को एक पुरानी diary मिलती है। उसमें लिखा है— “बारह मेहमान आएँगे। बारह इच्छाएँ जागेंगी। लेकिन हवेली में कमरे तेरह हैं।” अब सवाल है— तेरहवाँ कमरा किसका है?
All Chapters
- अध्याय 1 — काली हवेली
- अध्याय 2 — मेरे नाम का कमरा
- अध्याय 3 — पहली सज़ा
- अध्याय 4 — बारह गुप्त इच्छाएँ
- अध्याय 5 — जो मैंने चाहा ही नहीं
- अध्याय 6 — 1996 की रात
- अध्याय 7 — चाहतों की डायरी
- अध्याय 8 — हवेली का हत्यारा
- अध्याय 9 — तेरहवाँ कमरा
- अध्याय 10 — इच्छा किसकी थी?
- अध्याय 10 — इच्छा किसकी थी?
- अध्याय 11 — आख़िरी चाहत
- अध्याय 12 — काली हवेली
