दस साल पहले…
एक छोटे शहर में…
एक ही रात में…
चार लोगों की रहस्यमयी मौत हो गई।
पुलिस ने…
इसे हादसा मानकर…
फाइल बंद कर दी।
शहर के लोगों ने…
उस रात के बारे में बात करना छोड़ दिया।
गवाह…
खामोश हो गए।
पीड़ित परिवार…
बिखर गया।
और…
समय के साथ…
पूरा शहर मान बैठा…
कि सच हमेशा के लिए दफन हो चुका है।
लेकिन…
दस साल बाद…
खोजी पत्रकार अद्वैत रघुवंशी को…
एक पुरानी डायरी मिलती है।
उसकी आख़िरी पंक्ति पढ़कर…
उसकी रूह कांप उठती है—
“अगर मैं मर जाऊँ… तो समझ लेना कि मेरी खामोशी मेरी मर्ज़ी नहीं थी।”
अब…
जितना वह सच के करीब पहुँचता है…
उतने ही लोग…
चुप कराए जाने लगते हैं।
किसी की नौकरी चली जाती है…
कोई अचानक गायब हो जाता है…
और कोई…
अपनी बात कहने से पहले ही…
हमेशा के लिए खामोश कर दिया जाता है।
अब सवाल था—
क्या यह सिर्फ़ एक पुराना अपराध था…
या…
पूरे शहर की खामोशी…
किसी बहुत बड़ी साज़िश का हिस्सा थी?
