सारिका 34 साल की थी। दिल्ली के एक मध्यमवर्गीय मोहल्ले में बने छोटे-से फ्लैट में रहती थी, जहां हर सुबह खिड़की से सूरज की पहली किरण आती, लेकिन उसके मन में अंधेरा ही छाया रहता। बाहर से वह परफेक्ट लगती – एक अच्छी स्कूल टीचर, जो बच्चों को सपने देखना सिखाती, लेकिन खुद के सपनों को सालों से ताले में बंद करके रख चुकी थी। उसका पति, विवेक, एक सरकारी नौकरी वाला इंसान था – मेहनती, जिम्मेदार, लेकिन भावनाओं से कोसों दूर। शादी को आठ साल हो गए थे, बच्चा नहीं हुआ, और परिवार की हर सास-ननद की जुबान पर एक ही सवाल था: “अब कब होगा?” सारिका मुस्कुराती, चाय बनाती, स्कूल जाती, लेकिन रात को बिस्तर पर लेटकर सोचती – क्या यही मेरी ज़िंदगी है? क्या मैं सिर्फ एक अच्छी बहू, पत्नी और टीचर हूं, या इसके अलावा भी कुछ हूं?
उसके दिल में एक पुरानी चाबी पड़ी थी – बचपन की वो चाबी, जो उसने कभी किसी को नहीं दिखाई। वो चाबी उसके सपनों की थी: लिखना, घूमना, किसी से ऐसा प्यार करना जहां बातें दिल से दिल तक पहुंचें, जहां स्पर्श सिर्फ शरीर का नहीं, आत्मा का हो। लेकिन विवेक के साथ रिश्ता अब सिर्फ रूटीन था – सुबह चाय, शाम खाना, रात को टीवी। कोई गले लगना नहीं, कोई लंबी बातें नहीं। सारिका को लगता कि वह धीरे-धीरे मर रही है, अंदर से। परिवार का दबाव उसे कुचल रहा था, समाज कह रहा था “सब्र करो, सब ठीक हो जाएगा”। लेकिन अंदर एक तड़प थी – एक ऐसी चाहत जो उसे रातों को जगाती, कि काश कोई आए जो उसकी वो चाबी ढूंढ ले, और उसके सपनों का ताला खोल दे। क्या कभी ऐसा कोई आएगा? या वो हमेशा इसी कैद में रहेगी?
कभी-कभी स्कूल के बाद, जब बारिश होती, सारिका छत पर चली जाती। बारिश की बूंदें उसके चेहरे पर गिरतीं, और वो सोचती – क्या मेरी ज़िंदगी में भी कभी कोई बारिश आएगी जो सब कुछ धो दे? क्या कोई ऐसा हाथ होगा जो मुझे पकड़कर कहे, “तुम अकेली नहीं हो”? उसकी आंखों में आंसू और बारिश मिल जाते, और वो खुद से वादा करती – बस थोड़ा और सह लो। लेकिन अंदर से वो जानती थी, अब सहने की हद पार हो चुकी है।
