खोए हुए लोगों की ट्रेन

खोए हुए लोगों की ट्रेन
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भैरवपुर रोड एक छोटा junction था जिसे आसपास के लोग केवल इसलिए जानते थे क्योंकि वहाँ से बड़े शहरों के लिए connecting trains मिलती थीं। लेकिन स्थानीय लोगों के बीच एक पुरानी कहानी भी चलती थी। कहा जाता था—कुछ रातों में एक ऐसी ट्रेन platform पर आती है जिसका कोई schedule नहीं होता। कुछ लोग उसे देखते हैं। कुछ नहीं। कुछ कहते हैं वह सिर्फ उन लोगों के सामने रुकती है जो “कहीं और पहुँचने वाले” होते हैं। Railway records में ऐसी किसी train का कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता। लेकिन पिछले चालीस वर्षों में भैरवपुर रोड और आसपास के stations से जुड़े कई unexplained missing-person cases मौजूद हैं। कई लोग स्टेशन तक पहुँचे। फिर कभी नहीं मिले। उनका सामान मिला। कभी टिकट मिला। कभी CCTV में उन्हें platform तक जाते देखा गया। लेकिन उसके बाद—कुछ नहीं। आरव इन कहानियों पर विश्वास नहीं करता। वह एक सामान्य corporate employee है जो अपनी माँ से मिलने अपने hometown आया था। उसकी जिंदगी में कोई supernatural विश्वास नहीं। लेकिन रात 1:17 बजे वह एक ऐसी train में चढ़ जाता है जो शायद केवल उन्हीं लोगों के लिए आती है जिनका नाम दुनिया के किसी missing-person record में दर्ज होने वाला होता है। Train में मौजूद लोग अलग-अलग समय से आए हैं। किसी को लगता है अभी 1987 है। किसी को लगता है 2006। किसी की घड़ी बंद है। किसी का फोन काम नहीं करता। कुछ यात्री जानते हैं कि वे मर चुके हैं। कुछ इसे मानने से इनकार करते हैं। और कुछ—अपनी मौत को याद ही नहीं कर सकते। आरव धीरे-धीरे समझता है कि इस train का असली भय यह नहीं कि इसमें भूत हैं। बल्कि यह है कि हर यात्री के पीछे एक अधूरी कहानी है। एक परिवार। एक आखिरी फोन कॉल। एक unresolved disappearance। और शायद—हर खोया हुआ व्यक्ति मरा नहीं था। कुछ को किसी ने गायब किया था। कुछ भागे थे। कुछ दुर्घटना में मारे गए। और कुछ की fate आज तक कोई नहीं जानता। यह train उन सभी कहानियों को अपने compartments में लेकर चल रही है। लेकिन आरव के लिए सबसे बड़ा सवाल अलग है—उसका नाम इसमें क्यों जुड़ गया?

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