आख़िरी टिकट

आख़िरी टिकट
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34 वर्षीय फ्रीलांस फिल्म एडिटर विवेक सक्सेना को शहर के बंद होने वाले पुराने सिंगल-स्क्रीन हॉल प्रकाश टॉकीज़ में रात के आखिरी शो की एक रहस्यमयी टिकट मिलती है, जिस पर सीट नंबर नहीं, केवल दो शब्द लिखे होते हैं—आख़िरी टिकट। स्क्रीन पर जिस किरदार की मौत दिखाई जाती है, अगले दिन असल दुनिया में उसी नाम, उम्र और परिस्थिति वाला व्यक्ति मर जाता है। पहले वह इसे संयोग मानता है, लेकिन हर नई स्क्रीनिंग में फिल्म बदलती है, मौतें दोहराती हैं, और धीरे-धीरे फ्रेम में उसका अपना चेहरा आने लगता है। अब सवाल यह नहीं रह जाता कि अगला कौन मरेगा—सवाल यह बन जाता है कि आख़िरी टिकट अगली मौत देखने के लिए मिलती है, या अगली मौत बनने के लिए।

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