अपनी माँ की मृत्यु के बाद 33 वर्षीय documentary photographer समर अवस्थी पच्चीस साल बाद अपनी पुश्तैनी हवेली लौटता है। बचपन की उस हवेली से उसे केवल एक नियम याद है—“सूरज डूबने के बाद अपनी परछाई मत गिनना।” समर हमेशा इसे बच्चों को डराने वाली बात समझता रहा। लेकिन पहली रात ठीक 1:43 बजे corridor से गुजरते समय उसे दीवार पर अपनी परछाई दिखाई देती है। वह रुक जाता है। परछाई भी रुकती है। फिर समर आगे बढ़ता है—लेकिन परछाई वहीं खड़ी रहती है। कुछ seconds बाद दीवार पर दूसरी छोटी परछाई उभरती है और पहली परछाई का हाथ पकड़ लेती है। तभी पीछे से एक बच्ची की आवाज़ आती है—“समर भैया… इस बार मुझे अकेला छोड़कर मत जाना।”
All Chapters
- अध्याय 1 – मेरी परछाई वहीं खड़ी रही
- अध्याय 2 – दीवार पर हम दो नहीं थे
- अध्याय 3 – समर भैया, वापस आ गए?
- अध्याय 4 – इरा कौन थी?
- अध्याय 5 – रात में अपनी परछाई मत गिनना
- अध्याय 6 – उस रात 1:43 पर क्या हुआ था?
- अध्याय 7 – इरा के पीछे कौन खड़ा था?
- अध्याय 8 – वह परछाई किसी आदमी की नहीं थी
- अध्याय 9 – इरा उस रात मरी नहीं थी
- अध्याय 10 – माँ ने मुझे उसे क्यों भुला दिया?
- अध्याय 11 – मेरी याद में एक परछाई ज्यादा थी
- अध्याय 12 – रात की परछाइयाँ
