आगे बढ़ने से पहले:
इस कहानी में ऐसे विषय और भाषा-शैली हो सकती है जो हर पाठक के लिए सहज न हो।
कृपया अपनी समझ और विवेक से आगे बढ़ें।
काल्पनिक महानगर अम्बरगढ़ में रहने वाली अविका राठौड़ 33 वर्षीय portrait photographer है। उसका काम चेहरों को capture करना है। लेकिन भीतर से वह अपने ही चेहरे और जीवन से लगातार असंतुष्ट है। Career अच्छा है, लेकिन वैसा नहीं जैसा उसने कभी सपना देखा था। Relationship स्थिर नहीं। पुराना प्रेम अब किसी और के साथ है। और social media पर दूसरों की चमकदार जिंदगी देखते-देखते उसके भीतर एक धीमी तुलना बैठ चुकी है।
उसी समय उसकी मौसी की मृत्यु के बाद उसे एक पुराना bungalow विरासत में मिलता है। वहाँ का सबसे रहस्यमयी object—एक विशाल Venetian-style mirror। पुराने घर के documents में उसका उल्लेख केवल एक नाम से है—“इच्छा-दर्पण।”
अविका उसे रखने का फैसला करती है। पहले दो दिनों तक कुछ नहीं होता। फिर हर रात… आईना उसे ऐसी जिंदगी दिखाने लगता है जिसे वह consciously कभी स्वीकार नहीं करती। कभी अर्णव। कभी fame। कभी किसी दूसरी महिला जैसा चेहरा। कभी ऐसी जिंदगी जहाँ उसे कोई जिम्मेदारी नहीं। कभी ऐसी identity जिसमें उसका नाम तक अलग है। और फिर… इन visions के बाद… उसका चेहरा बदलने लगता है। सबसे पहले मामूली। फिर पहचानने योग्य। फिर डरावना।
मामले में प्रवेश करते हैं—एसीपी विराज सेन, forensic imaging specialist डॉ. समायरा कोहली, और identity psychologist डॉ. रिवाक्षी मेनन। लेकिन असली सवाल शीशा क्या दिखाता है, यह नहीं। सवाल है—“शीशा इच्छा दिखा रहा है… या यह तय कर रहा है कि आपको क्या चाहना चाहिए?”
All Chapters
- अध्याय 1 – पुराना शीशा
- अध्याय 2 – जो जिंदगी मेरी नहीं थी
- अध्याय 3 – दूसरी औरत की मुस्कान
- अध्याय 4 – क्या मैं उसे चाहती थी?
- अध्याय 5 – पुराने चेहरे
- अध्याय 6 – तस्वीर में मैं कौन हूँ?
- अध्याय 7 – ईरा ने भी शीशा देखा था
- अध्याय 8 – चेहरों का कमरा
- अध्याय 9 – इच्छा किसकी है?
- अध्याय 10 – जिसने मेरा चेहरा चुना
- अध्याय 11 – बिना चेहरे की रात
- अध्याय 12 – जादुई शीशा
