एक मुट्ठी दया

एक मुट्ठी दया
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कभी-कभी जिंदगी हमें ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर देती है, जहाँ हमारे पास देने के लिए न पैसा होता है, न कोई बड़ी मदद…

बस होती है तो एक छोटी-सी दया, दो मीठे शब्द और किसी का हाथ थाम लेने की इंसानियत।

और विश्वास मानिए…

कभी-कभी यही छोटी-सी दया किसी टूटे हुए इंसान को फिर से जीने की वजह दे देती है।

जिस पिता ने अपनी पूरी जिंदगी बच्चों के भविष्य के नाम कर दी, वही बुढ़ापे में बच्चों के लिए बोझ बन गया।

जिसने अपने बच्चों के सपनों के लिए अपनी इच्छाएँ कुर्बान कर दीं, उसके अपने बुढ़ापे में सिर्फ एक सपना बचा—

“काश… कोई मुझे अपना समझकर दो पल मेरे पास बैठ जाए।”

यह कहानी सिर्फ रामदयाल की नहीं है।

यह उन हजारों माता-पिता की कहानी है, जिन्होंने बच्चों को उड़ना सिखाया और फिर एक दिन वही बच्चे इतने दूर उड़ गए कि पीछे मुड़कर देखना भी भूल गए।

लेकिन…

कभी-कभी भगवान हमारी मदद के लिए कोई चमत्कार नहीं करते।

वे बस किसी अजनबी इंसान को हमारे रास्ते में भेज देते हैं।

आइए पढ़ते हैं एक ऐसे पिता की कहानी, जिसके पास देने के लिए कुछ नहीं बचा था…

लेकिन उसकी दुआओं में इतनी ताकत थी कि पूरी दुनिया उसके साथ खड़ी हो गई।

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