मध्यप्रदेश की पहाड़ियों के बीच बसा काल्पनिक शहर कालगढ़ अपनी पुरानी इमारतों और शांत जिंदगी के लिए जाना जाता था।
लेकिन शहर की सबसे प्रसिद्ध इमारत थी—काला घंटीघर।
सन् 1899 में बने इस घंटीघर के पत्थर समय के साथ इतने गहरे हो चुके थे कि स्थानीय लोग उसे “काली घंटीघर” कहने लगे थे।
घंटीघर के नीचे एक विशाल पीतल की पट्टिका लगी थी। उस पर शहर के उन 41 परिवारों के नाम लिखे थे जिन्होंने वर्षों पहले घंटीघर के पुनर्निर्माण में योगदान दिया था।
लेकिन घंटीघर से जुड़ी एक पुरानी कहानी भी थी।
बुज़ुर्ग कहते थे—52 वर्ष पहले शहर में एक रात ऐसी आई थी जब घंटी लगातार तेरह बार बजी थी। अगली सुबह शहर के बाहरी हिस्से की एक पूरी मजदूर बस्ती खाली मिली। सरकारी रिकॉर्ड में लिखा गया—लोग रोजगार की तलाश में शहर छोड़कर चले गए। लेकिन किसी ने उन्हें जाते नहीं देखा था।
उस घटना के बीस वर्ष बाद घंटीघर की मुख्य घड़ी अचानक बंद हो गई। और फिर 32 वर्षों तक उसकी सुइयाँ नहीं हिलीं।
अब वही घड़ी दोबारा चल रही थी। उल्टी दिशा में। और हर रात एक नया नाम चुन रही थी।
पहले अभिराज सेठी। फिर स्कूल प्रिंसिपल वामिका त्रिपाठी। फिर व्यापारी नक्ष वर्धन। तीन रातें। तीन नाम। तीन लोग गायब।
शहर में अफवाह फैल जाती है—“काली घंटीघर अपना हिसाब लेने वापस आ गया है।”
मामले की जांच के लिए क्राइम ब्रांच अधिकारी एसीपी इरा प्रताप कालगढ़ पहुँचती हैं। उनके साथ forensic engineer डॉ. अथर्व कौल और स्थानीय इतिहास शोधकर्ता युवान भारद्वाज जांच शुरू करते हैं।
पहली ही रात इरा स्वयं घंटीघर के सामने खड़ी होकर घड़ी को उल्टा चलते देखती है। वह mechanism जांचने ऊपर जाती है। लेकिन वहाँ उसे एक ऐसी चीज़ मिलती है जिससे मामला बदल जाता है।
घड़ी के अंदर धूल से ढकी दीवार पर 52 वर्ष पुरानी तारीख लिखी है। उसके नीचे 41 नाम—वही 41 उपनाम जो नीचे पीतल की पट्टिका पर मौजूद हैं। लेकिन ऊपर एक और पंक्ति लिखी है—
“जिन्होंने हमें मिटाया था…
उनके नाम अब घड़ी मिटाएगी।”
All Chapters
- अध्याय 1 – पहला नाम
- अध्याय 2 – उल्टी चलती घड़ी
- अध्याय 3 – दूसरी सुबह
- अध्याय 4 – इकतालीस नाम
- अध्याय 5 – गायब बस्ती
- अध्याय 6 – घंटीघर के नीचे
- अध्याय 7 – जो गायब हुआ, वह मरा नहीं
- अध्याय 8 – तेरहवीं घंटी
- अध्याय 9 – अगला नाम इरा
- अध्याय 10 – वह रात जिसे शहर ने मिटा दिया
- अध्याय 11 – घड़ी के पीछे का आदमी
- अध्याय 12 – आख़िरी घंटी
