काल्पनिक महानगर नूरगढ़ में रहने वाली इराज़ खान 35 वर्षीय emergency physician है। वह चमत्कारों पर नहीं, medicine और evidence पर विश्वास करती है। उसकी जिंदगी अचानक तब टूटती है जब उसका छोटा भाई साहिर एक गंभीर दुर्घटना के बाद critical condition में पहुँच जाता है। उसी समय उसके हाथ लगता है एक पुराना पीतल का दीपक।
पहली इच्छा— भाई को बचाना। पूरी होती है। पहली कीमत— माहिरा।
इराज़ खुद से वादा करती है— वह दोबारा कोई इच्छा नहीं माँगेगी। लेकिन जिंदगी उसे जल्दी परखती है। कुछ दिनों बाद साहिर को होश आता है। लेकिन उसे दुर्घटना वाली रात के बारे में कुछ ऐसा याद है जिससे पता चलता है— दुर्घटना शायद accident नहीं थी। वह किसी powerful व्यक्ति का नाम लेने वाला होता है। उसी शाम उस पर दोबारा हमला होता है।
इराज़ दीपक के सामने खड़ी है। जिन कहता है— “तुम्हें पता है मुझे क्या कहना है।”
इराज़ दीपक नहीं छूती। फिर अस्पताल monitor पर साहिर की हालत गिरती है। वह आखिरकार कहती है— “जिसने मेरे भाई के साथ यह किया… वह कभी उसे नुकसान न पहुँचा सके।”
अगली सुबह… एक संदिग्ध व्यक्ति मानसिक रूप से पूरी तरह टूट चुका मिलता है। जिंदा। लेकिन अपने नाम तक से अनजान। दीपक के नीचे— “2”
अब इराज़ समझती है— “आत्मा लेना” हमेशा हत्या नहीं। और यही इसे और भयावह बनाता है।
