आगे बढ़ने से पहले:
इस कहानी में ऐसे विषय और भाषा-शैली हो सकती है जो हर पाठक के लिए सहज न हो।
कृपया अपनी समझ और विवेक से आगे बढ़ें।
आशा, 36 वर्ष की एक मध्यमवर्गीय गृहिणी, तलाक के छह महीने बाद दिल्ली के एक सामान्य मोहल्ले में अकेली रहती है। उसकी 10 वर्षीय बेटी आराध्या उसके साथ है। पूर्व पति विक्रम अब गुरुग्राम में नौकरी करता है और महीने में एक-दो बार आराध्या से मिलने आता है। आशा परिवार को फिर से जोड़ने की कोशिश करती है—आराध्या की खुशी के लिए, मायके की इज्जत के लिए—पर अंदर ही अंदर सालों से दबी भावनात्मक और शारीरिक असंतुष्टि धीरे-धीरे उभर रही है। पड़ोस की फुसफुसाहटें, मां की चिंता, और एक अनजान पुरुष की छोटी-छोटी मुलाकातें सस्पेंस पैदा करती हैं। क्या वह अपनी तड़प को दबाकर परिवार बचा पाएगी, या कोई अप्रत्याशित घटना सब बदल देगी?
