1947 का बंटवारा। लाहौर से दिल्ली की ओर भागते शरणार्थियों की भीड़। भीषण हिंसा, खून और आग के बीच एक युवा महिला, सरला, अपने परिवार से बिछड़ जाती है। अफरातफरी में एक रात वह रवींद्र नामक युवक के साथ आश्रय लेती है। दोनों के बीच सहानुभूति का रिश्ता गहरा हो जाता है, लेकिन बंटवारे की हिंसा में रवींद्र की मौत हो जाती है। सरला गर्भवती हो जाती है।
समाज की कट्टर नज़रों और अपराधबोध के बोझ तले सरला दिल्ली के एक छोटे से मोहल्ले में अपना जीवन शुरू करती है। वह अपने बेटे, अर्जुन को अकेले पालती है, लेकिन कभी उसे सच्चाई नहीं बताती। अर्जुन को लगता है कि उसके पिता शहीद हुए हैं।
दस साल बाद, 1957 में, अर्जुन अब 10 साल का हो चुका है। उसकी जिज्ञासा बढ़ती जाती है। पड़ोस की अफवाहें, पुरानी तस्वीरें और एक अनजान खत उसके अस्तित्व पर सवाल खड़े करते हैं। सरला का अपराधबोध दिन-रात उसे घेरता रहता है। वह सोचती है कि क्या उसने अपने बेटे को सच्चाई से बचाकर सही किया, या उसे और ज़्यादा घाव दिए।
यह कहानी माँ के अपराधबोध, बंटवारे के दर्द और एक love child की छाया की है। जहाँ एक ओर ऐतिहासिक त्रासदी परिवारों को बिखेरती है, वहीं दूसरी ओर समाज की कठोरता और माँ-बेटे के रिश्ते में छिपी पीड़ा उजागर होती है। कहानी guilt, identity, forgiveness और मातृत्व की जटिल भावनाओं को गहराई से छूती है। पाठक स्वयं को सरला की पीड़ा और अर्जुन की भ्रमित दुनिया में पाएगा।
