कठोर प्रतिबिंब

कठोर प्रतिबिंब
Text size
👁 10,152 views

काल्पनिक शहर नूराबाद का 38 वर्षीय चित्रकार अद्वैत रैना कभी भारतीय contemporary art जगत का उभरता हुआ नाम था।
लेकिन पिछले चार वर्षों में…
उसकी कला की चमक फीकी पड़ चुकी थी।
नई प्रदर्शनियाँ असफल।
समीक्षाएँ कठोर।
कर्ज बढ़ता जा रहा था।
और सबसे दर्दनाक बात—
लोग उसकी नई paintings की तुलना उसके पुराने काम से करके कहते—
“अद्वैत अपनी सबसे अच्छी कला शायद पहले ही बना चुका है।”
एक कलाकार के लिए इससे अधिक भयावह वाक्य शायद ही कोई हो।
इसी दौरान…
पुरानी वस्तुओं के एक व्यापारी युवान मेहरोत्रा उसे एक विशाल दर्पण देता है।
काले लकड़ी के फ्रेम वाला…
लगभग सौ वर्ष पुराना दिखाई देने वाला दर्पण।
युवान केवल एक बात कहता है—
“इसे वहाँ रखना जहाँ तुम चित्र बनाते हो।
कभी-कभी कलाकार को canvas से ज्यादा अपने प्रतिबिंब को देखने की जरूरत होती है।”
अद्वैत दर्पण अपने स्टूडियो में लगा देता है।
और उसी रात…
महीनों बाद…
वह एक शानदार painting बनाता है।
उसके बाद…
उसकी जिंदगी बदलने लगती है।
नई कला।
नई प्रसिद्धि।
पुराना प्रेम वापस।
अंतरराष्ट्रीय पहचान।
पैसा।
सम्मान।
वह जो चाहता है…
मानो उसे मिलने लगता है।
लेकिन हर सफलता के बाद…
उसकी जिंदगी से कुछ छोटा-सा बदल जाता है।
उसके सहायक को याद है कि एक प्रसिद्ध painting अद्वैत ने नहीं, किसी और ने बनाई थी।
एक पुरानी तस्वीर में…
अद्वैत की जगह…
दूसरा व्यक्ति दिखाई देता है।
उसकी पूर्व प्रेमिका को उनकी पहली मुलाकात का अलग संस्करण याद है।
फिर…
एक युवा कलाकार रिवांश कौल अचानक कला-जगत में उभरता है।
उसकी paintings…
अद्वैत जैसी हैं।
उसके gestures…
अद्वैत जैसे हैं।
उसकी पसंद…
अद्वैत जैसी है।
और सबसे विचित्र—
वह ऐसी निजी यादों के बारे में बात करता है…
जो केवल अद्वैत जानता है।
अद्वैत को लगने लगता है—
दर्पण उसकी इच्छाएँ पूरी नहीं कर रहा।
वह…
हर इच्छा के बदले…
किसी और को…
अद्वैत बना रहा है।

All Chapters

Leave a Reply

Scroll to Top