पुराना डाकघर

पुराना डाकघर
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शहर के पुराने हिस्से में…
करीब सौ साल पुराना…
एक डाकघर था…
जो बीस साल पहले हमेशा के लिए बंद कर दिया गया था।
दिन में…
वह वीरान इमारत…
सिर्फ़ टूटी खिड़कियों और धूल भरी मेज़ों का ढेर लगती थी।

लेकिन…
हर रात…
ठीक 12 बजे…
उसके जंग लगे दरवाज़े अपने आप खुल जाते थे।
सुबह…
डाकघर फिर बंद मिल जाता।
एक रात…
स्थानीय पत्रकार विवान शर्मा हिम्मत करके अंदर गया।
उसे वहाँ…
लकड़ी के पुराने काउंटर पर…
कुछ नई चिट्ठियाँ मिलीं।
हर चिट्ठी पर…
आज की तारीख थी।
लेकिन…
उनमें जो लिखा था…
वह अगले दिन सच हो गया।
एक सड़क हादसा…
एक बड़ी चोरी…
एक रहस्यमयी मौत…
सब कुछ…
वैसा ही हुआ…

जैसा चिट्ठियों में पहले से लिखा था।
अब सवाल था—
क्या कोई भविष्य देख सकता था…
या कोई…
भविष्य बनने से पहले ही…
उसे लिख रहा था?

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