मध्य प्रदेश के उपजाऊ मालवा क्षेत्र में, इंदौर शहर से लगभग ३० किलोमीटर दूर स्थित रामपुरा गांव में जीवन धीमा और कठिन था। यहां की मिट्टी सोना उगलती थी, किंतु पिछले दो वर्षों से आसमान ने साथ नहीं दिया। सूखे की मार ने खेतों को सूखा चट्टान बना दिया था।
भानु प्रताप सिंह, पचास वर्षीय अनुभवी किसान, अपनी पत्नी लक्ष्मी देवी, बेटे अर्जुन (२२ वर्ष) और बेटी मीरा (१७ वर्ष) के साथ एक छोटे से मिट्टी के घर में रहते थे। भानु प्रताप के पिता की मृत्यु रहस्यमय परिस्थितियों में हुई थी। गांव वाले अभी भी फुसफुसाते थे कि उनके पिता और चाचा के बीच जमीन को लेकर जो विवाद हुआ था, उसमें कुछ गहरा राज छिपा है।
भानु प्रताप दिन भर खेतों में पसीना बहाते, किंतु कर्ज का बोझ उनके कंधों पर पहाड़ बन गया था। गांव का साहूकार लाला रामचंद्र हर सप्ताह ब्याज वसूलने आता और धमकियां देता, “भानु, इस बार समय पर पैसे न दिए तो खेतों पर कब्जा कर लूंगा।”
लक्ष्मी देवी चुपचाप घर संभालतीं, किंतु रातों को नींद नहीं आती थी। अर्जुन शहर में नौकरी की तलाश में बेचैन रहता, जबकि मीरा स्कूल से लौटकर खेतों में मदद करती। परिवार की एकता दिखती थी, किंतु अंदर ही अंदर दरारें बन रही थीं।
एक शाम, जब सूरज ढल रहा था और खेतों पर लंबी परछाइयां पड़ रही थीं, भानु प्रताप सिंह सिंचाई के लिए नया कुआं खोदने निकले। कुदाल की पहली चोट में ही धातु की ठनक सुनाई दी। मिट्टी हटाते ही एक पुरानी, जंग लगी लोहे की संदूक निकली। हवा में अचानक ठंडक फैल गई। भानु का हाथ कांप गया। संदूक पर कोई नाम नहीं था, किंतु उसकी सतह पर पुरानी खरोंचें ऐसी लग रही थीं मानो किसी ने जानबूझकर छिपाने की कोशिश की हो।
उन्होंने संदूक को खोला। अंदर पुरानी कागजात, कुछ सोने के सिक्के और एक फटी हुई तस्वीर थी। तस्वीर में उनके पिता और चाचा खड़े थे, किंतु चाचा की आंखों में एक अजीब-सी चमक थी जो भानु को आज तक परेशान करती थी।
ठीक उसी क्षण, दूर खेतों के किनारे एक काली छाया हिलती दिखाई दी। भानु ने चौंककर देखा, किंतु छाया गायब हो चुकी थी। हवा में हल्की-सी सिसकारी जैसी आवाज गूंजी।
भानु प्रताप सिंह ने संदूक को जल्दी से मिट्टी में वापस दबा दिया और घर की ओर तेज कदमों से लौटे। उनके चेहरे पर पसीना था, किंतु आंखों में भय के साथ-साथ एक अज्ञात उत्सुकता भी।
उस रात से रामपुरा गांव के खेतों में कुछ बदल गया था। अंधेरा अब केवल रात का नहीं, बल्कि एक पुराने राज का हिस्सा बन गया था।
