रामपुर नामक एक छोटा-सा गाँव, जो घने पहाड़ों की छाया में बसा हुआ था, दशकों से अंधेरे की कैद में जी रहा था। वहाँ की रातें इतनी गहन होती थीं कि चाँद की रोशनी भी मुश्किल से घरों तक पहुँच पाती। लालटेनों की मद्धिम पीली चमक और मशालों की लपटें ही परिवारों की एकमात्र साथी थीं। गाँववासी दिन भर खेतों में परिश्रम करते और शाम ढलते ही घर लौट आते, जहाँ कहानियाँ सुनाने और डरावने किस्सों के बीच उनकी रातें बीततीं।
बिजली का नाम सुनकर सबके मन में एक दूर की आशा जागती, पर वह आशा वर्षों से अधूरी रहती आई थी। सरकारी वादे आते-जाते, कागजों पर हस्ताक्षर होते, लेकिन खंभे नहीं गड़े जाते थे। फिर एक दिन, अप्रत्याशित रूप से, भाग्य ने एक साधारण किसान श्यामलाल के घर को चुना। उनका पुराना, जर्जर मकान—गाँव के किनारे पर खड़ा—पहला वह घर बनने जा रहा था जिसे बिजली का स्पर्श मिलने वाला था।
जब मजदूरों ने तारें बिछाईं, खंभे गाड़े और अंत में स्विच ऑन किया, तो उस रात रामपुर के इतिहास में एक नया अध्याय शुरू हुआ। एक बल्ब की सफेद, चकाचौंध भरी रोशनी ने श्यामलाल के घर को जगमगा दिया। बच्चे उत्साह से चिल्लाए, सरला की आँखें आनंद से भर आईं, और गाँववासी दूर से यह दृश्य देखकर हैरान रह गए। लेकिन इस उजाले के साथ एक अजीब सा सन्नाटा भी आया।
क्योंकि जैसे ही पहली रात गहराई में उतरी, रोशनी में हल्की-सी झिलमिलाहट हुई। दीवारों पर छायाएँ नाचने लगीं। एक हल्की खरखराहट सुनाई दी, मानो कोई पुरानी आत्मा जाग रही हो। क्या यह महज नई बिजली की तकनीकी खराबी थी, या फिर उस पुराने घर में दबा कोई सदियों पुराना रहस्य अब उजागर होने को था?
यह कहानी है उस पहली रोशनी की—जो आशा लाई, पर साथ में संदेह और भय भी। एक रोशनी जो अंधेरे को दूर करने आई, लेकिन शायद खुद अंधेरे को और गहरा कर दे।
