सन्नाटे की घूँघट

सन्नाटे की घूँघट
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राजस्थान के काल्पनिक नगर मृगगढ़ में स्थित चंद्रकोट हवेली अपनी बंद खिड़कियों, लंबे गलियारों और सफेद परदों के लिए प्रसिद्ध थी। उस हवेली में रहने वाले वर्धन परिवार की प्रतिष्ठा पूरे क्षेत्र में थी। परिवार का दावा था कि उनकी बड़ी बहू कुमुदिनी वर्धन पच्चीस वर्ष पहले विवाह के कुछ महीनों बाद घर छोड़कर चली गई थी। लेकिन गाँव वालों का कहना था— कुमुदिनी कभी हवेली से बाहर निकली ही नहीं। उसके गायब होने के बाद परिवार ने हवेली के हर दर्पण और खिड़की पर सफेद परदे लगवा दिए। उसकी तस्वीरें हटा दी गईं। उसका नाम लेना बंद कर दिया गया। और जिस कमरे में वह रहती थी… उसे ईंटों से बंद कर दिया गया। पच्चीस वर्ष बाद… परिवार के मुखिया शौर्येन्द्र वर्धन की मृत्यु के बाद सभी उत्तराधिकारी वसीयत पढ़ने के लिए हवेली लौटते हैं। पहली ही रात… बिना हवा के… सभी परदे एक साथ हिलने लगते हैं। सबसे छोटे उत्तराधिकारी ईश्विक वर्धन को परदों के पीछे किसी स्त्री की परछाईं दिखाई देती है। अगली सुबह… वसीयत तैयार करने वाला पुराना वकील मृत मिलता है। उसकी मुट्ठी में… कुमुदिनी के नाम का आधा जला हुआ पत्र दबा होता है। मामले की जांच एसीपी रेवती मान को सौंपी जाती है। उनके साथ वास्तु एवं वायु-प्रवाह विशेषज्ञ डॉ. तन्मय भट्ट, फॉरेंसिक मनोवैज्ञानिक डॉ. शाश्वती घोष और अभिलेख शोधकर्ता अहिलान कुरैशी हवेली के परदों, बंद कमरों और परिवार की चुप्पी की जांच शुरू करते हैं। लेकिन… जैसे-जैसे हर परदा हटता है… उन्हें समझ आता है कि परिवार ने केवल एक स्त्री का चेहरा नहीं छिपाया था। उन्होंने… उसकी पूरी पहचान… उसकी संतान… और उसके साथ हुए अपराध को… इतिहास से मिटा दिया था।

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