कुछ रिश्ते दिल से बनते हैं…
कुछ रिश्ते मजबूरी से।
लेकिन क्या मजबूरी में बना रिश्ता कभी सच्चा बन सकता है?
अविका, एक आत्मनिर्भर लेकिन अकेली लड़की, अपने जीवन की मुश्किल परिस्थितियों से लड़ रही होती है। दूसरी तरफ रेयांश, एक सफल लेकिन भावनात्मक रूप से टूटा हुआ इंसान, दुनिया के सामने मजबूत दिखता है लेकिन अंदर से खाली है।
एक परिस्थिति दोनों को एक ऐसे समझौते में बाँध देती है जहाँ रिश्ता सिर्फ़ नाम का होता है।
दुनिया के सामने उन्हें साथ रहना पड़ता है।
मुस्कुराना पड़ता है।
एक-दूसरे का साथ निभाने का नाटक करना पड़ता है।
लेकिन समय के साथ नकली बातें असली भावनाओं में बदलने लगती हैं।
दो अजनबी एक-दूसरे की आदत बनने लगते हैं।
मगर जब रिश्ता सच होने लगता है, तभी सामने आता है वह कारण जिसके लिए यह रिश्ता बनाया गया था।
क्या भरोसे की नींव एक झूठ पर रखी जा सकती है?
क्या किराए का रिश्ता कभी दिल का रिश्ता बन सकता है?
All Chapters
- अध्याय 1: मजबूरी का समझौता
- अध्याय 2: नाम का रिश्ता, अनजानी सीमा
- अध्याय 3: नकली मुस्कान की पहली शाम
- अध्याय 4: छोटी-छोटी आदतें, बढ़ती बेचैनी
- अध्याय 5: अतीत की परछाइयाँ
- अध्याय 6: विश्वास की पहली दरार
- अध्याय 7: दिल की अनकही पुकार
- अध्याय 8: झूठ का बोझ और सच्चाई की झलक
- अध्याय 9: परीक्षा की घड़ी
- अध्याय 10: किराए से दिल तक का सफर
