अपनी दादी जानकी की मृत्यु के बाद 35 वर्षीय sound-documentary filmmaker अर्णव त्रिपाठी लगभग पच्चीस साल बाद पत्नी सिया के साथ अपने पुश्तैनी गाँव भैरवपुर लौटता है। बचपन से उसे घर का एक नियम याद है—रात के तीसरे पहर दरवाज़े पर कोई भी पुकारे, दरवाज़ा मत खोलना। पहली रात ठीक 3:17 बजे मुख्य दरवाज़े पर तीन दस्तक होती हैं। बाहर से एक बच्ची की आवाज़ आती है—“भैया, इस बार दरवाज़ा खोल देना।” अर्णव उस आवाज़ को पहचान नहीं पाता, लेकिन अगले दिन उसे बचपन की एक cassette मिलती है जिसमें वही बच्ची उसे “अर्णव भैया” कह रही है। Cassette पर केवल एक नाम लिखा है—“मीरा — तीसरा पहर।” परिवार का दावा है कि मीरा नाम की कोई बच्ची इस घर में कभी रही ही नहीं।
All Chapters
- अध्याय 1 – रात का तीसरा पहर
- अध्याय 2 – भैया, इस बार दरवाज़ा खोल देना
- अध्याय 3 – पैरों के निशान घर से बाहर जा रहे थे
- अध्याय 4 – मीरा कौन थी?
- अध्याय 5 – रात 3:17 की आवाज़
- अध्याय 6 – उस रात दरवाज़े के किस तरफ कौन था?
- अध्याय 7 – दादी ने दरवाज़ा खोलने से क्यों मना किया था?
- अध्याय 8 – आवाज़ बाहर से नहीं आई थी
- अध्याय 9 – मीरा उस रात मरी नहीं थी
- अध्याय 10 – सब जानते थे कि वह जिंदा है
- अध्याय 11 – तुम बाहर थे, अर्णव
- अध्याय 12 – तीसरा पहर फिर आया
