देहरादून से…
मसूरी जाने वाली…
पुरानी रात्रि बस…
रूट 27A…
पिछले बारह वर्षों से…
एक ही समय पर चलती थी।
हर महीने…
कम से कम…
एक यात्री…
रास्ते में…
बिना कोई निशान छोड़े…
गायब हो जाता।
ड्राइवर…
कंडक्टर…
और…
सीसीटीवी…
सभी कहते—
बस में…
आख़िरी स्टॉप तक…
एक अतिरिक्त मुसाफ़िर बैठा रहता था।
जब…
एक प्रसिद्ध उद्योगपति का बेटा…
उसी बस से…
लापता हो जाता है…
तो…
जांच की जिम्मेदारी मिलती है…
एसीपी विहान चौहान को।
उनके साथ…
क्राइम पत्रकार ईरा वशिष्ठ…
और…
फॉरेंसिक विशेषज्ञ डॉ. नैरा अंसारी…
इस रहस्य की तह तक पहुँचने निकलते हैं।
लेकिन…
जैसे-जैसे…
वे बस की पिछली यात्राओं की जांच करते हैं…
उन्हें एहसास होता है…
कि…
आख़िरी मुसाफ़िर…
कोई भूत नहीं…
बल्कि…
एक ऐसा चेहरा है…
जिसे…
हर कोई देखता है…
लेकिन…
कोई पहचान नहीं पाता।
