इंतकाम की रात

इंतकाम की रात
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अंधेरी रात के साए में, जब पूरा शहर सोया हुआ था, एक अकेला आदमी पुरानी हवेली की छत पर खड़ा था। उसके हाथ में एक पुरानी तस्वीर थी, जिसके कोनों पर समय ने पीला रंग चढ़ा दिया था। तस्वीर में मुस्कुराती हुई वह औरत अब सिर्फ यादों में सिमट गई थी। “आज रात सब कुछ खत्म हो जाएगा,” उसने धीरे से कहा, आवाज में जहर और दर्द का घालमेल।

अर्जुन राय, शहर का सफल व्यवसायी, जिसे हर कोई ईर्ष्या की नजर से देखता था, आज अपनी ही जड़ों को खोदने निकला था। दस साल पहले हुई उस रात ने उसके जीवन को हमेशा के लिए बदल दिया था। प्रेम, विश्वास और परिवार की नींव पर टिका हुआ उसका संसार एक पल में बिखर गया था। जिसे वह अपना सबसे करीबी मानता था, उसी ने उसे धोखा दिया था। अब वह वापस लौटा है—इंतकाम लेने।

लेकिन इंतकाम की राह आसान नहीं होती। पुरानी हवेली की दीवारें राज छिपाए हुए हैं। वो चिट्ठियां, वो फोटो, वो गुप्त मीटिंग्स—हर चीज एक नया सवाल खड़ी कर रही है। क्या वाकई जिसे वह दोषी मान रहा है, वही असली अपराधी है? या फिर कोई और चेहरा है जो अंधेरे में मुस्कुरा रहा है?

जैसे-जैसे अर्जुन पुराने घावों को कुरेदता जा रहा है, उसके अपने अतीत का सबसे बड़ा रहस्य सामने आने वाला है—एक ऐसा रहस्य जो न सिर्फ उसके इंतकाम को हिला देगा, बल्कि पूरे परिवार की जड़ें हिला देगा।

और ठीक उसी रात, जब घड़ी बारह बजने वाली थी, हवेली के अंदर से एक चीख गूंजी।

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