दिल्ली की तंग गलियों और ऊँची इमारतों के बीच, जहाँ हर सुबह एक नई भागदौड़ शुरू होती है और हर शाम पुरानी यादें साँस लेती हैं, पूजा नाम की एक औरत रहती थी। उम्र सिर्फ़ 31 साल। रिश्ता – सिंगल मदर। पहचान – आरव की माँ। और दिल के किसी कोने में – एक अधूरी, अनसुलझी मौत की विधवा।
पाँच साल पहले एक कार एक्सीडेंट ने उसके पति अमर को छीन लिया था। पुलिस ने केस बंद कर दिया – “सड़क दुर्घटना”। लेकिन पूजा के भीतर एक सवाल कभी शांत नहीं हुआ: क्यों? अमर की आखिरी बातें, उसकी आँखों में छिपा हुआ अपराधबोध, और वह अंतिम वाक्य – “मुझे माफ़ करना” – ये सब एक पहेली की तरह उसके मन में उलझे रहे।
वह रोज़ आरव को स्कूल छोड़ती, नौकरी करती, घर संभालती, मुस्कुराती – लेकिन रात को जब शहर सो जाता, तब वह अकेले अलमारी के सामने खड़ी होकर अमर की पुरानी चीज़ों को छूती और सोचती: क्या सच में सब खत्म हो गया? या अभी कुछ बाकी है?
फिर एक शाम, उसी अलमारी के सबसे पीछे छिपे एक छोटे लकड़ी के बॉक्स ने उसकी जिंदगी को हमेशा के लिए बदल दिया। अंदर थीं तीन चिट्ठियाँ। अमर की आखिरी आवाज़। और एक नाम – साहिल।
यहीं से शुरू होती है पूजा की असली यात्रा। एक यात्रा जिसमें मिलेंगे:
- मौत का छिपा हुआ सच
- पुराने कर्ज़ों और धमकियों का साया
- एक ऐसे आदमी का साथ जो सिर्फ़ मदद नहीं, बल्कि भावनात्मक आश्रय बनने वाला है
- और सबसे बड़ी लड़ाई – अतीत से मुक्ति पाने की।
ये कहानी सिर्फ़ एक सिंगल मदर की नहीं है। ये उस हर औरत की है जो अकेले खड़ी होकर भी हार नहीं मानती। ये उस प्यार की है जो टूटकर भी नए सिरे से जन्म ले सकता है। और ये उस मुक्ति की है जो दर्द के दूसरी तरफ़ इंतज़ार कर रही होती है।
