एक बरसाती रात में चलने वाली एक पुरानी ट्रेन “मौत एक्सप्रेस” वर्षों बाद फिर पटरी पर लौटती है।
कहा जाता है कि यह ट्रेन एक बार सफर शुरू कर दे, तो हर स्टेशन पर कोई न कोई यात्री कम हो जाता है।
कुछ लोग इसे अफवाह मानते हैं।
कुछ इसे रेलवे का पुराना हादसा कहते हैं।
लेकिन जिन लोगों ने इस ट्रेन में सफर किया है, वे कभी सामान्य होकर वापस नहीं लौटे।
इस बार ट्रेन में बैठे यात्रियों को धीरे-धीरे एहसास होता है कि वे किसी साधारण सफर पर नहीं हैं।
घड़ी हर रात 12:13 पर रुक जाती है।
एक डिब्बा ऐसा है जो टिकट में दर्ज ही नहीं।
हर यात्री के पास कोई न कोई छुपा हुआ पाप है।
और ट्रेन जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, हर किसी का अतीत उसके सामने जीवित होकर लौटने लगता है।
क्या यह ट्रेन सचमुच मौत की ओर जा रही है?
या यह उन लोगों को उनके कर्मों का हिसाब देने आई है?
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- अध्याय 1: पटरी पर लौटती साया
- अध्याय 2: बरसाती रात की पहली सीटी
- अध्याय 3: 12:13 का ठहराव
- अध्याय 4: गुम टिकट और अनजान यात्री
- अध्याय 5: बंद डिब्बे की दस्तक
- अध्याय 6: अतीत की जीवित परछाइयाँ
- अध्याय 7: कर्मों का पहला हिसाब
- अध्याय 8: सुनसान स्टेशन का इंतजार
- अध्याय 9: अंतिम यात्री का राज़
- अध्याय 10: मौत का आखिरी प्लेटफॉर्म
