मौत की घंटी

मौत की घंटी
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देवगढ़ के पुराने पुश्तैनी घर में एक बंद कमरा है, जिसकी दीवार पर सौ साल पुरानी पीतल की घंटी लगी है। परिवार का नियम है—आधी रात के बाद अगर वह अपने-आप बजे, तो कोई उसे छुएगा नहीं और यह जानने की कोशिश भी नहीं करेगा कि उसने किसकी मौत की घोषणा की है। पच्चीस साल बाद आरव उस घर में लौटता है और पहली ही रात घंटी बजती है। अगली सुबह परिवार का एक सदस्य मृत मिलता है। असली डर तब शुरू होता है जब आरव को पता चलता है कि घंटी मौत आने से पहले नहीं, बल्कि किसी ऐसी मौत के बाद बजती है जिसे दुनिया अभी तक मौत मानती ही नहीं।

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