बनारस का लेखक

बनारस का लेखक
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वाराणसी… जहाँ हर गली एक कहानी सुनाती है। अस्सी घाट के पास एक छोटा-सा पुराना पुस्तकालय, जहाँ आर्यमान त्रिपाठी—एक संघर्षरत लेखक—अपनी पहली किताब के लिए प्रेरणा ढूँढ़ रहा था। उसी दिन उसे धूल से ढकी एक अधूरी पांडुलिपि मिलती है। जैसे-जैसे वह उसे पढ़ता है, उसे एहसास होता है कि उसमें लिखी घटनाएँ उसकी अपनी ज़िंदगी से अजीब तरह से मिलती-जुलती हैं। और उस पांडुलिपि के पीछे छिपा है बीस साल पुराना एक साहित्यिक अपराध, जिसने कई ज़िंदगियाँ बदल दी थीं।

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