मध्यप्रदेश के एक शांत कस्बे शिवपुर में स्थित आनंद भवन हवेली, जहाँ एक ही परिवार चार पीढ़ियों से रह रहा था। पच्चीस वर्ष पहले परिवार के सभी बच्चे एक पुराने बाल संस्कार शिविर में साथ गए थे। वहाँ एक बच्चा रहस्यमय तरीके से गायब हो गया। मामले को दुर्घटना कहकर हमेशा के लिए बंद कर दिया गया।
समय बीत गया। बच्चे बड़े हो गए, अपनी-अपनी ज़िंदगी में व्यस्त हो गए। लेकिन एक रात मुखिया राजवीर त्रिपाठी की मृत्यु के बाद दरवाज़े पर पहला पर्चा मिला। उसमें परिवार के सबसे बड़े बेटे नक्ष त्रिपाठी के बचपन का ऐसा सच लिखा था, जो उसने कभी किसी को नहीं बताया था।
जब पर्चे में लिखी घटना जांच में सच साबित होने लगी, तो मामले की जिम्मेदारी एसीपी अदिति चौहान को दी गई। उनके साथ फॉरेंसिक दस्तावेज़ विशेषज्ञ डॉ. विवान जोशी और बाल मनोवैज्ञानिक डॉ. ईरा सक्सेना उस रहस्यमयी पर्चे और भूले हुए बचपन का सच खोजने निकलते हैं।
