देवगढ़ के पुराने पुश्तैनी घर में एक बंद कमरा है, जिसकी दीवार पर सौ साल पुरानी पीतल की घंटी लगी है। परिवार का नियम है—आधी रात के बाद अगर वह अपने-आप बजे, तो कोई उसे छुएगा नहीं और यह जानने की कोशिश भी नहीं करेगा कि उसने किसकी मौत की घोषणा की है। पच्चीस साल बाद आरव उस घर में लौटता है और पहली ही रात घंटी बजती है। अगली सुबह परिवार का एक सदस्य मृत मिलता है। असली डर तब शुरू होता है जब आरव को पता चलता है कि घंटी मौत आने से पहले नहीं, बल्कि किसी ऐसी मौत के बाद बजती है जिसे दुनिया अभी तक मौत मानती ही नहीं।
All Chapters
- अध्याय 1 — आधी रात की घंटी
- अध्याय 2 — मौत के सोलह मिनट बाद
- अध्याय 3 — घर में दूसरा बच्चा
- अध्याय 4 — कबीर कौन था?
- अध्याय 5 — पश्चिम वाली दीवार
- अध्याय 6 — सावित्री कबीर को कहाँ ले गई?
- अध्याय 7 — घंटी को बाँध दो
- अध्याय 8 — उस रात कौन मरा था?
- अध्याय 9 — दादी का झूठ
- अध्याय 10 — कबीर उस रात नहीं मरा था
- अध्याय 11 — मौत की घंटी किसके लिए बजती थी?
- अध्याय 12 — आख़िरी बार घंटी बजी
