बहू की जिद

बहू की जिद
Text size
👁 18,212 views

नई-नवेली बहू वैदिशा एक ऐसे संयुक्त परिवार में आती है जहाँ वर्षों से एक ही नियम चलता आया है—”बहुएँ सिर्फ़ घर संभालती हैं, फैसले नहीं लेतीं।”

लेकिन वैदिशा बाकी बहुओं जैसी नहीं है। वह ज़िद्दी है, मगर घमंडी नहीं। वह अपने अधिकारों के लिए लड़ना जानती है, मगर रिश्ते तोड़ना नहीं चाहती।

उसकी सबसे बड़ी जिद यह है कि घर की हर बहू और बेटी को बराबरी का सम्मान मिले, बेटियों को भी संपत्ति में अधिकार मिले, घर की महिलाओं को अपनी पसंद से पढ़ने, काम करने और अपने फैसले लेने की आज़ादी मिले।

शुरुआत में पूरा परिवार उसकी इस सोच का विरोध करता है। सास उसे बगावती कहती है, रिश्तेदार उसे घर तोड़ने वाली बहू बताते हैं और पति भी परिवार तथा पत्नी के बीच फँस जाता है।
लेकिन धीरे-धीरे घर के पुराने राज़, वर्षों से दबे हुए दर्द और महिलाओं के त्याग सामने आने लगते हैं। वैदिशा की जिद केवल उसकी नहीं, बल्कि इस घर की हर औरत की आवाज़ बन जाती है।

क्या उसकी जिद परिवार को तोड़ देगी?
या वही जिद इस परिवार को पहली बार सच में एक कर देगी?

All Chapters

Leave a Reply

Scroll to Top