मध्यप्रदेश के मालवा क्षेत्र में स्थित काल्पनिक कस्बे भैरवपुर में शिवांश कोठी पिछले सत्तर वर्षों से माहेश्वरी परिवार की पहचान थी।
परिवार का विशाल कृषि और कपड़ा व्यवसाय था।
बाहर से…
सब कुछ आदर्श दिखाई देता था।
लेकिन परिवार के बुज़ुर्ग मुखिया गिरिधर माहेश्वरी की मृत्यु के बाद सभी उत्तराधिकारी वसीयत पढ़ने के लिए पुराने घर में लौटते हैं।
उसी रात…
बरसात के बीच…
मुख्य दरवाज़े के बाहर एक जोड़ी पुरानी चप्पल मिलती है।
चप्पल के तलवे पर…
सूखी काली मिट्टी…
पुरानी नीली स्याही…
और…
अंदर की तरफ केवल दो अक्षर खुदे होते हैं—
“भ. द.”
परिवार की वरिष्ठ महिला सरोजिनी देवी चप्पल देखते ही घबरा जाती हैं।
वह केवल इतना कहती हैं—
“इसे घर से बाहर फेंक दो…
ये उसी की हैं।”
लेकिन…
जब उनसे पूछा जाता है कि “उसी” से उनका मतलब कौन है…
वह जवाब नहीं देतीं।
अगली सुबह…
गिरिधर के निजी कमरे से…
एक पुरानी पारिवारिक तस्वीर…
आधा फटा जन्म प्रमाणपत्र…
और…
बीस वर्ष पुरानी रेल टिकट मिलती है।
उसी दिन परिवार का पुराना अकाउंटेंट रहस्यमय तरीके से गायब हो जाता है।
मामले की जांच एसीपी वेदिका राणे को सौंपी जाती है।
उनके साथ फॉरेंसिक फुटवियर विशेषज्ञ डॉ. निहार पाठक, पारिवारिक मनोवैज्ञानिक डॉ. सैरंध्री मेनन और अभिलेख शोधकर्ता अर्णेश बोहरा चप्पल, पैरों के निशान और मिटाई गई पारिवारिक पहचान की जांच शुरू करते हैं।
लेकिन…
जैसे-जैसे सच सामने आता है…
उन्हें एहसास होता है कि घर में दिखाई देने वाला “अजनबी” शायद कभी अजनबी था ही नहीं।
वह…
इसी परिवार का वह सदस्य था…
जिसका नाम…
तस्वीरों…
वसीयत…
और रिश्तों से…
जानबूझकर मिटा दिया गया था।
All Chapters
- अध्याय 1 – दरवाज़े पर चप्पल
- अध्याय 2 – गीले पैरों के निशान
- अध्याय 3 – तस्वीर का चौथा चेहरा
- अध्याय 4 – “भ. द.” का रहस्य
- अध्याय 5 – गायब अकाउंटेंट
- अध्याय 6 – मिटाया गया जन्म प्रमाणपत्र
- अध्याय 7 – परिवार में पहली बड़ी दरार
- अध्याय 8 – रेल टिकट वाला अतीत
- अध्याय 9 – झूठा उत्तराधिकारी
- अध्याय 10 – अजनबी घर के अंदर
- अध्याय 11 – गिरिधर का आख़िरी सच
- अध्याय 12 – अजनबी की चप्पल
