वसीयत का सच
दादा…ठाकुर हरिदेव सिंह…पूरे गाँव की सबसे सम्मानित शख्सियत थे।उनकी हवेली…सिर्फ़ एक घर नहीं…बल्कि…पूरे परिवार की पहचान थी। उनके निधन के […]
दादा…ठाकुर हरिदेव सिंह…पूरे गाँव की सबसे सम्मानित शख्सियत थे।उनकी हवेली…सिर्फ़ एक घर नहीं…बल्कि…पूरे परिवार की पहचान थी। उनके निधन के […]
रात के…ठीक बारह बजे…पुराने रेलवे पुल पर…एक लड़की दिखाई देती थी।सफेद कपड़े…हाथ में पुरानी लालटेन…और…चेहरे पर…एक अजीब-सी मुस्कान। वह…हर रात…उसी
शादी को…सिर्फ़ सात महीने हुए थे।दक्ष को लगता था…उसकी ज़िंदगी अब पूरी हो चुकी है।आहाना…उसकी मुस्कान की वजह थी। लेकिन…एक
शहर में…आठ महीनों के भीतर…आठ हत्याएँ हो चुकी थीं।हर बार…लाश के पास…एक सफेद मुखौटा रखा मिलता था।ना उंगलियों के निशान…ना
पच्चीस साल पहले…एक धार्मिक मेले की भीड़ में…सिर्फ़ पाँच साल का…आर्यवीर सिंह…अचानक गायब हो गया।पूरे शहर में…उसकी तलाश हुई।पोस्टर लगे…इनाम
हर सुबह…अद्वैत शर्मा…समय पर ऑफिस जाता था।सबको मुस्कुराकर मिलता था।हर किसी की मदद करता था।लोग कहते थे…“इससे खुश इंसान हमने
दिल्ली…मुंबई…जयपुर…देहरादून…चार शहर…चार अलग नाम…चार अलग ज़िंदगियाँ…लेकिन…चेहरा…एक ही था। दिल्ली में…वह आदित्य मल्होत्रा था।मुंबई में…विवान अरोड़ा।जयपुर में…अर्जुन राठौड़।और…देहरादून में…समर्थ कपूर। हर
शहर का…सबसे पुराना…और सबसे आलीशान होटल।होटल ग्रैंड क्राउन। लेकिन…उसकी तीसरी मंज़िल पर…एक कमरा था…रूम 309। बीस सालों से…उस कमरे के
शहर से करीब पचास किलोमीटर दूर एक पुरानी सड़क थी।लोग कहते थे रात के बारह बजे वहाँ लाल जोड़े में
दस साल पहले…रुद्रांश देव…सब कुछ खो चुका था।उसका परिवार…उसका करियर…उसकी पहचान…सब कुछ…एक ऐसी साज़िश में…खत्म कर दिया गया…जिसका कोई सबूत…कभी